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नटराज और अप्सरा पेंसिल की शुरुआत तीन दोस्तों ने की थी, अब 50 देश से अधिक में चल रहा बिजनेस

बचपन में सभी ने नटराज पेंसिल का प्रयोग जरूर किया होगा। जब भी कोई पेंसिल लेने जाता था या फिर किसी से भी पेंसिल का नाम पूछा जाए तो सभी सबसे पहले नटराज का ही नाम लेते हैं। छोटे बच्चों की फेवरेट पेंसिल नटराज के बारे में आप को जानकारी देते हैं और बताते हैं कि इस पेंसिल की शुरुआत कैसे हुई। पहले के जमाने में भारत में विदेशी फलों का ज्यादा उपयोग किया जाता था जिसके बाद भारतीय पेंसिल कोई खरीदना ही पसंद नहीं करता था।

भारत में चलती थी विदेशी पेंसिल

यह उस समय की बात है जब भारत पर अंग्रेजों का शासन हुआ करता था उस समय हर चीज विदेश से बनकर आते थे और भारत में विदेशी कंपनियां अपना पैसा बना पाते थे 1940 के आसपास भारत में लगभग 6.5 लाख रुपए की पेंसिल जर्मनी, ब्रिटेन, जापान जैसे देशों से आयात की जाती थी। इसके बाद जब द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई तो यह कारोबार एकदम से बंद हो गया था अब वक्त था भारत में भारत की बनाई हुई पेंसिल बेचने का।

जर्मनी से पेंसिल बनाना सिखा फिर मुंबई से की शुरुआत

द्वितीय विश्वयुद्ध जब खत्म हो गया था तो इसके बाद से एक बार फिर से विदेशी पेंसिल की सप्लाई शुरू हो गई थी तब देसी पेंसिले कहां उनके आगे अपना वर्चस्व बना पाती। जब भारत देश आजाद हो गया तो इसके बाद विदेशी सामान का आयात पहले की तुलना में काफी कम हो गया था और सरकार भी बाहर की वस्तुओं के आयात पर काफी प्रतिबंध लगा चुकी थी। अब मौका था देसी निर्माताओं को अपने व्यापार में बढ़ोतरी करने का। इस समय कुछ दोस्तों ने जर्मनी से सीख कर मुंबई में अपना व्यापार शुरू किया।

नटराज पेंसिल की शुरुआत

आज आपको नटराज पेंसिल की शुरुआत के बारे में बताने वाले हैं। आपको बता दें कि तीन दोस्त विजय सांगवी, रामनाथ मेहरा और मनसुकनी ने 1958 में हिंदुस्तान पेंसिल्स के नाम से एक कंपनी की शुरुआत की। इसके बाद इन्होंने कंपनी का पहला प्रोडक्ट नटराज पेंसिल बनाया जिसे बनाने की कला विदेशों से सीख कर आए थे धीरे-धीरे यह पेंसिल लोगों को बहुत अधिक पसंद आने लगी। इसके बाद पूरे भारत में नटराज पेंसिल की बिक्री शुरू हो गई।आपको बता दें कि नटराज और अप्सरा पेंसिल दोनों एक ही कंपनी के द्वारा बनाए जाते हैं। 1996 पहले नटराज पेंसिल बनाई गई इसके बाद 1970 में अप्सरा पेंसिल की शुरुआत हो गई थी।

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