home page

बोन फ्रेजाइल डिसऑर्डर जैसी गंभीर बीमारी, 8 ऑपरेशन, परिवार और समाज की उपेक्षा के बाद भी IRS बनीं उम्मूल खैर

कहते हैं न कि उड़ान पंखों से नहीं बल्कि हौसलों से होती है, आईआरएस अफसर उम्मूल खैर इसकी मिसाल हैं. संघर्ष के कई किस्से सुने होंगे लेकिन उम्मूल के संघर्ष की कहानी सुनकर हर कोई प्रेरित हो जाएगा. एक रूढ़िवादी परिवार में जन्मी उम्मूल ने झोपड़ी में रहकर पढ़ाई की. बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए
 | 
बोन फ्रेजाइल डिसऑर्डर जैसी गंभीर बीमारी, 8 ऑपरेशन, परिवार और समाज की उपेक्षा के बाद भी IRS बनीं उम्मूल खैर

कहते हैं न कि उड़ान पंखों से नहीं बल्कि हौसलों से होती है, आईआरएस अफसर उम्मूल खैर इसकी मिसाल हैं. संघर्ष के कई किस्से सुने होंगे लेकिन उम्मूल के संघर्ष की कहानी सुनकर हर कोई प्रेरित हो जाएगा. एक रूढ़िवादी परिवार में जन्मी उम्मूल ने झोपड़ी में रहकर पढ़ाई की.

बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए अपनी फीस का खर्च उठाया और 2017 में यूपीएससी की परीक्षा पास की. लेकिन सब बातें उम्मूल की जिंदगी के संघर्ष और कठिनाइयों के आगे बहुत छोटी हैं. आइए जानते हैं कि झोपड़ी में रहने वाली IRS उम्मूल आज कैसे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा हैं.

गंभीर बीमारी की शिकार

उम्मूल को बचपन से बोन फ्रेजाइल डिसऑर्डर (Fragile Bone Disorder) नाम की बीमारी थी. इस बीमारी में इंसान की हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं और कभी भी टूट सकती हैं. ओस्टियोजेनेसिस (Osteogenesis imperfecta) की गंभीर बीमारी से पीड़ित उम्मूल की अब तक 17 बार हड्डियां टूट चुकी हैं और उन्हें 8 ऑपरेशन झेलने पड़े हैं.

इतनी गंभीर परेशानियों के बावजूद उम्मूल के जज्बे में कभी कमी नहीं आई और उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर यूपीएससी की परीक्षा पास की.

शुरुआती दिन

उम्मूल खेर का जन्म राजस्थान के पाली में हुआ. परिवार का खर्चा उठाना मुश्किल था, इसलिए रोजगार की तलाश में उम्मूल के पिता दिल्ली आ गए और निजामुद्दीन की झुग्गियों में रहने लगे. झुग्गियों में उम्मूल अपने पिता और सौतेली मां के साथ रहा करती थी.

एक वक्त ऐसा आया जब निजामुद्दीन इलाके की झुग्गियां तोड़ दी गईं, इसके बाद बिना किसी छत के सहारे, उम्मूल के परिवार को त्रिलोकपुरी जाना पड़ा.

पढ़ाई का खर्च खुद उठाया

उम्मूल के पिता निजामुद्दीन में कपड़ों की फेरी लगाकर कपड़े बेचा करते थे, इससे घर का खर्च निकाल पाना भी मुश्किल था, तो पढ़ाई की बात तो दूर थी. छोटी सी उम्र में ही उम्मूल ने झुग्गी में रहने वाले बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और पढ़ाई का खर्च उठाया.

सपनों के लिए छोड़ा अपनों का साथ

जब आठवीं की पढ़ाई पूरी हुई तो उम्मूल के परिवार ने आगे की पढ़ाई करने पर रोक लगा दी, लेकिन उम्मूल के इरादे इतने पक्के थे कि उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने की खातिर घर छोड़ दिया और पढ़ाई के लिए परिवार से दूर अलग कमरा लेकर रहने लगीं.

कैसे पास किया यूपीएससी का एक्जाम

उम्मूल बच्चों को दिन-रात ट्यूशन पढ़ाती थीं और फिर अपनी पढ़ाई भी करती थी. इस बीच उनके पास खाना खाने तक का वक्त नहीं होता था. एक इंटरव्यू में अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उम्मूल ने बताया कि वक्त की कमी के कारण कई बार उन्हें चार दिन पुरानी रोटियां खानी पड़ती थीं जिन पर फफूंद भी आ जाती थी.

ऐसी तमाम दिक्कतों के साथ पढ़ाई करने के बाद पहले उम्मूल ने जेएनयू जैसी यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा पास कर ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की इसके बाद अपने पहले ही अटेंप्ट में यूपीएससी निकाला.

बोन फ्रेजाइल डिसऑर्डर जैसी गंभीर बीमारी, 8 ऑपरेशन, परिवार और समाज की उपेक्षा और पैसे की कमी के बावजूद देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने वाली उम्मूल अकेली थीं लेकिन अब उनके पास परिवार से लेकर समाज तक सबका साथ है.