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जानिये क्यों नहीं खाना चाइये तेहरवी का भोजन

दोस्तों भगवान् ने इंसानों और दुसरे जिव जन्तुओ के लिए एक विधान बनाया गया है वो है की जो आदमी इस दुनिया में आता है उसको एक दिन जाना भी होता है .जब एक बच्चा पैदा होता है तो उसके होने की ख़ुशी में घर में भोज वगेरा या फिर दावत होता है उसी तरह जब कोई इन्सान दुनिया छोड़ कर जाता है उसके लिए भोज होता है जिसको मृत्यु भोज कहा जाता है .लेकिन कई लोग तेहरवी का भोजन खाते है लेकिन क्या आप जानते है की तेहरवी का भोजन नहीं खाना चाइये तो चलिए जानते है क्यों नहीं खाना चाइये .

क्यों नहीं खाना चाइये मृत्यु भोज 

दुनिया में बहुत से धर्म है जिनके अलग अलग रीती रिवाज है वैसे ही हिन्दू धर्म है इस धर्म में एक नियम है जिसको कहते है मृत्यु भोज है आपको नहीं पता हो तो एक बात बता दे की हिन्दू धर्म में 16 संस्कार है जिसमे से पहले संस्कार तो है गर्भाधान और सोलहवा संस्कार है वो है अंत्येष्टि .लेकिन मृत्यु भोज को 17 वा संस्कार कहा जाता है लेकिन जब 17 वा संस्कार बनाया ही नहीं तो इसको करने का क्या फायदा .

तेहरवी का भोजन करने के लिए तो कई लोग जाते है लेकिन उनको इस बारे में कुछ नहीं पता होता है ,आपको बता दे की तेहरवी का भोजन वैसे तो उनके लिए होता है जो अंतिम किर्या करना के लिए घाट पर गए होते है .लेकिन धीरे धीरे समय बीतने लगा और अब सब कुछ बदल गया है और अब तेहरवी में वो लोग भी जाते है जो अंतिम क्रिया में नहीं गए होते है .

अगर हम अपने धर्म की किताबो को देखे तो उसमे कही भी मृत्यु भोज का कही भी जीकर नहीं किया गया है वही महाभारत में ये लिखा गया है की जो मृत्यु भोज का भोजन करता है उसकी उर्जा ख़तम होती है .दरसल जब श्री कृषण दुर्योधन के पास गए थे संधि प्रस्ताव ले कर की युद्ध न करे लेकिन उसने कृषण जी का प्रस्ताव मना कर दिया .तब श्री कृषण का मन बहुत खिन हुआ और जब वो जाने लगे तो दुर्योधन ने उनको भोजन करने का प्रस्ताव दिया तो श्री कृषण जी ने मना करते हुए कहा की भोजन तभी करना चाइये जब मन परसन्न हो तब नहीं करना चाइये जब मन दुखी हो .

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