अंग्रेजी और देसी शराब के बीच क्या होता है खास फर्क, हर रोज पीने वाले भी नही जानते ये बात

Manoj aggarwal
3 Min Read

जो व्यक्ति शराब पीते हैं उन्हें अलग-अलग ब्रांड के नाम पता होते हैं. परंतु क्या आप जानते हैं की अंग्रेजी शराब और देसी शराब में क्या अंतर होता है. ज्यादातर देसी शराब पीने वाले लोग गांव और शहरों में काम करने वाले मजदूर होते हैं. तो चलिए आज जानते हैं कि आखिर देसी शराब, अंग्रेजी शराब से कैसे अलग होती है और इनको बनाने की प्रक्रिया में क्या अंतर है.

बनाने की प्रक्रिया में नहीं है अंतर

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि अंग्रेजी शराब और देसी शराब बनाने की प्रक्रिया में ज्यादा अंतर नहीं है. दोनों को ही शिरे या फिर अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाता है और दोनों को बनाने की प्रक्रिया भी लगभग एक समान ही रहती है.

पहले इसे पूरी तरह से फर्मेंटेशन के पश्चात इनका डिस्टिल किया जाता है. उसके बाद इसे पैक किया जाता है. ज्यादा देसी शराब को प्लास्टिक के पाउच या फिर थालिया में या डब्बो में पैक किया जाता है. जबकि अंग्रेजी शराब की पैकिंग देसी शराब की पैकिंग से अलग होती है.

क्या है देसी दारू

यदि बात करें देसी दारू की तो यह प्योरिफाइड स्रिट या डिस्टिल्ड होता है. इसमें कोई भी फ्लेवर नहीं डाला जाता. वहीं यदि अंग्रेजी शराब की बात करें तो अंग्रेजी शराब बनाने वाली कंपनियां भी अपना कच्चा माल स्रिट देसी दारू बनाने वाली कंपनियों से ही लेती है परंतु इसके पश्चात इसमें फ्लेवर डाला जाता है

और इसकी अच्छे से पैकिंग कर इसको मार्केट में पहुंचाया जाता है जबकि देसी दारू में कोई भी फ्लेवर नहीं होता. देसी दारू को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है. टॉल बॉय नाम की दारू पश्चिम बंगाल और झारखंड और पूर्वी राज्यों में बहुत अधिक प्रसिद्ध है. वही इसके और भी नाम है जैसे की हीर रांझा, घूमर, जीएम संतरा और जीएम लिंबू पंच आदि.

देसी दारू की बिक्री बढी

भारत में बिकने वाले शराब में दो तिहाई हिस्सा लगभग देसी दारू का होता है. आपको बता दे कि भारत में लगभग देसी दारू के 242 मिलियन केस बिकते हैं जो कि भारत के शराब उद्योग का लगभग 30 प्रतिशत है. देसी दारू में अल्कोहल की मात्रा 42.5% होती है परंतु इसे पीना कई बार नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि देसी दारू कई बार अच्छे से डिस्टिल नहीं होता है.

Share this Article